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आदिवासियों के महानायक: बिरसा मुंडा का संघर्ष, जागरण और बलिदान

एडिटर अमित गौतम

आदिवासी समाज के लिए अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले महान स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को झारखंड के खूंटी जिले में एक साधारण आदिवासी परिवार में हुआ। पिता सुगना पुर्ती और माता करमी पुर्ती के घर जन्मे बिरसा ने अपना संपूर्ण जीवन आदिवासियों को जागरूक करने और ब्रिटिश हुकूमत के दमन के खिलाफ संघर्ष में समर्पित कर दिया।

अंधविश्वास और कुरीतियों के विरुद्ध सामाजिक जागरण

बिरसा मुंडा ने महसूस किया कि आदिवासी समाज अंधविश्वास, झाड़-फूंक, कुरीतियों और पाखंड की जंजीरों में जकड़ा हुआ है। उन्होंने समाज को समझाया कि ज्ञान, स्वच्छता, शिक्षा और सहयोग ही उत्थान का मार्ग हैं। उनके प्रयासों से आदिवासी समाज में एक नई सामाजिक चेतना जागृत हुई।

इस सामाजिक परिवर्तन से जमींदार, जागीरदार और पाखंडी झाड़-फूंक करने वाले नाराज हो गए। ब्रिटिश शासन भी उनकी बढ़ती लोकप्रियता से भयभीत हो उठा और षड्यंत्रों का दौर शुरू हो गया।

आर्थिक शोषण के खिलाफ अदम्य संघर्ष

बिरसा मुंडा ने आदिवासियों को आर्थिक शोषण से मुक्त कराने के लिए उन्हें एकजुट किया।

जमींदारों द्वारा थोपे गए बेगारी प्रथा के विरोध में उन्होंने जनांदोलन किया, जिसके परिणामस्वरूप अनेक जमींदारों और जागीरदारों के खेतों और वन क्षेत्रों में कामकाज ठप पड़ गया।

यह आंदोलन आदिवासी आर्थिक आत्मसम्मान का प्रतीक बन गया।

राजनीतिक चेतना का सूत्रपात

सामाजिक और आर्थिक संघर्षों से सशक्त हुए आदिवासी जब संगठित होने लगे, तब बिरसा मुंडा ने राजनीतिक स्तर पर भी उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक किया।

यह वह समय था, जब आदिवासियों ने पहली बार अपने राजनीतिक हक़ की आवाज बुलंद की।

बिरसा मुंडा ब्रिटिश शासन के लिए चुनौती बन चुके थे। इसलिए उन्हें बार-बार गिरफ्तार किया गया।

अंग्रेजों की यातना और शहादत

ब्रिटिश शासन ने उनकी बढ़ती लोकप्रियता को खतरे के संकेत के रूप में देखा। 1900 में गिरफ्तार करने के बाद जेल में उन्हें धीमा ज़हर दिया गया, जिसके चलते 9 जून 1900 को 25 वर्ष की अल्प आयु में उनका निधन हो गया।

उनकी शहादत ने पूरे आदिवासी समाज में विद्रोह की नई लहर जगा दी।

प्रकृति-समर्पित ‘बिरसाइत धर्म’ का उदय

1894 में बिरसा मुंडा ने प्रकृति आधारित ‘बिरसाइत धर्म’ की स्थापना की। इस धर्म में

गुरुवार को पेड़-पौधों की टहनी, फूल, दातून तोड़ने की मनाही,

हल चलाने पर निषेध,

मांस, मदिरा, तंबाकू व बीड़ी से दूरी,

जैसे नियमों को अपनाया गया।

इस धर्म के प्रसार के लिए उन्होंने 12 शिष्यों की नियुक्ति की

महान देशभक्त और आदिवासी गौरव

बिरसा मुंडा केवल एक क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि सामाजिक सुधारक, आध्यात्मिक गुरु और राजनीतिक जागरण के प्रणेता थे। उनकी गिनती भारत के महानतम स्वतंत्रता सेनानियों में की जाती है।

आज भी आदिवासी समाज उन्हें “धरती आबा” (धरती पिता) के नाम से सम्मानित करता है।

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