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नववर्ष के उपलक्ष पर निरंकारी सतगुरु का खुशियों और आशीष भरा पावन संदेश

निरंकार की रजा में जीवन जीना ही सच्ची साधना

निरंकारी सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज

आजमगढ / संत निरंकारी मिशन सत्संग भवन हरबंशपुर आजमगढ जोन 61 से मीडिया सहायक डा.बीरेन्द्र कुमार सरोज ने जानकारी देते हुए बताया कि ‘निरंकार की रजा में जीवन जीना ही सच्ची साधना है।’ यह प्रेरणादायक प्रवचन निरंकारी सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज द्वारा नववर्ष के शुभ अवसर पर दिल्ली स्थित ग्राउंड नम्बर 8, निरंकारी चैक, बुराड़ी रोड में आयोजित विशेष सत्संग समारोह में व्यक्त किए गये। इस सत्संग में दिल्ली, एन.सी.आर. सहित विभिन्न राज्यों से हजारों श्रद्धालुगण सम्मिलित हुए। सभी भक्तों ने नव वर्ष के प्रथम दिन सतगुरु माता जी एवं निरंकारी राजपिता जी के पावन सान्निध्य में उनके दिव्य दर्शन और प्रेरणादायक प्रवचनों से आत्मिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का सुखद आनंद प्राप्त किया।

सतगुरु माता जी ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि नववर्ष का प्रथम दिवस हमें संतों के वचनों को सुनने और उन्हें जीवन में अपनाने का अनमोल अवसर देता है। जहाँ संसार वर्ष की शुरुआत मौज-मस्ती से करता है, वहीं संत सत्य और सत्संग का मार्ग चुनते हैं। सत्संग से आरंभ हुआ जीवन हर पल निरंकार के एहसास को और अधिक दृढ़ करता चला जाता है।

तार्किक रूप से नववर्ष केवल धरती का सूर्य के चारों ओर एक चक्कर और ऋतुओं का परिवर्तन है। हम शुभकामनाएँ देते हैं और नए संकल्प लेते हैं, पर वास्तविक परिवर्तन तभी सार्थक होता है जब वह भीतर से आए। संत आत्ममंथन द्वारा सकारात्मक परिवर्तन लाते हैं और निरंकार को सर्वोपरि मानते हुए सेवा, सुमिरन और सत्संग को जीवन की प्राथमिकता बनाते हैं।

सतगुरु माता जी ने कहा कि एक भक्त की यही कामना होती है कि हर नया वर्ष उसे पहले से अधिक सेवा, सुमिरन और सत्संग से जोड़े, साथ ही वह अपनी सांसारिक जिम्मेदारियों को भी पूरी निष्ठा से निभाए। जब जीवन स्वयं संदेश बन जाए और कर्म शब्दों से अधिक बोलें, तभी सच्ची साधना का स्वरूप प्रकट होता है। इसी क्षण में, पूरी चेतन अवस्था के साथ, निरंकार के एहसास में जीना ही वास्तविक जीवन है, क्योंकि भूत और भविष्य माया का रूप हैं। जब मन में यह विश्वास दृढ़ हो जाए कि कल भी दातार की रज़ा थी और आज भी उसकी कृपा है, तो चिंता स्वतः समाप्त हो जाती है और जीवन सहज और संतुलित बन जाता है।

नववर्ष केवल तारीख़ का परिवर्तन नहीं, बल्कि प्रेम, मिठास, सौम्यता और समझ को अपनाने का अवसर है। मनमुटाव और द्वेष से दूर रहकर, दूसरों के भावों को समझते हुए, दोषों पर पर्दा डालकर गुणों को अपनाना ही सच्ची भक्ति है। हर श्वास में सुमिरन हो, हर क्षण में निरंकार का वास हो, यही नववर्ष का सच्चा अर्थ और संदेश है। नव वर्ष के अवसर पर सतगुरु माता जी ने अंत में सभी श्रद्धालुओं के लिए सुख, समृद्धि और आनंदमय जीवन की शुभकामनाएं प्रदान की।

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