शासन के निर्देशानुसार शिब्ली नेशनल कॉलेज, आजमगढ़ में शुक्रवार को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के अवसर पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में भारत-विभाजन के ऐतिहासिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रभावों पर विस्तार से चर्चा की गई। महाविद्यालय के सभागार में आयोजित कार्यक्रम को कार्यक्रम संयोजक प्रो. आसिफ कमाल ने महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. अफसर अली की अध्यक्षता में सुचारू रूप से संपन्न कराया।
कार्यक्रम का संचालन बी.एड. विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर मोहम्मद उजैर ने किया। उन्होंने ‘विभाजन विभीषिका’ पर संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत करते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा से अवगत कराया। बी.एड. विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सीमा सादिक ने वर्ष 1947 के भारत-विभाजन को भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक बताते हुए कहा कि विभाजन ने करोड़ों लोगों को अपने घर-बार, जमीन-जायदाद और रिश्ते-नाते छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। लाखों निर्दोष लोगों की जानें गईं तथा असंख्य महिलाएँ, बच्चे और बुजुर्ग हिंसा एवं अमानवीयता के शिकार हुए। उन्होंने कहा कि ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ जैसे देशप्रेम से ओत-प्रोत गीत के रचयिता इकबाल ने भी विभाजन का समर्थन नहीं किया और अपनी रचनाओं के माध्यम से इसके दर्द को अभिव्यक्त किया।
उर्दू विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. मोहम्मद ताहिर ने सआदत हसन मंटो की कहानी ‘टोबा टेक सिंह’ का उदाहरण देते हुए विभाजन की त्रासदी और उससे उपजे मानवीय दर्द को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। बी.एड. विभाग के छात्र राम गणेश यादव एवं मोहम्मद वामिस ने विभाजन की पूर्वपीठिका पर प्रकाश डालते हुए देशप्रेम से संबंधित शायरी का पाठ किया। वक्ताओं ने यह भी उल्लेख किया कि सरोजिनी नायडू ने जिन्ना को कभी हिंदू-मुस्लिम एकता का अग्रदूत माना था, किंतु बाद में देश का धार्मिक आधार पर विभाजन हुआ, जिसके परिणामस्वरूप लाखों लोगों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ा।
इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. अलाउद्दीन ख़ान ने कहा कि विभाजन ने केवल राजनीतिक सीमाओं को नहीं बदला, बल्कि समाज की आत्मा को भी गहरी चोट पहुँचाई। बी.एड. विभाग की छात्रा अंकिता ने विभाजन की त्रासदी में अचेत भीड़ की भूमिका पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि आखिर वे कैसी परिस्थितियाँ थीं, जिनमें लोग किसी एक राजनीतिक नेतृत्व के आह्वान पर विभाजनकारी परिस्थितियों का हिस्सा बनने को तैयार हो गए।
इतिहास विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. शहरयार ने कहा कि भारत का विभाजन केवल भौगोलिक सीमाओं का बँटवारा नहीं था, बल्कि यह लाखों लोगों के दिलों में गहरे जख्म छोड़ जाने वाली मानवीय त्रासदी थी। ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ हमें उस दर्दनाक इतिहास की याद दिलाता है, जब इंसानियत ने सबसे कठिन परीक्षा का सामना किया। यह दिवस केवल पीड़ा और क्षति का स्मरण नहीं, बल्कि एक चेतावनी भी है कि नफरत, कट्टरता और सांप्रदायिकता के परिणाम कितने भयावह हो सकते हैं।
प्राचार्य प्रो. अफसर अली ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह स्मृति दिवस हमें प्रेरित करता है कि हम जाति, धर्म और भाषा की दीवारों को तोड़कर भाईचारे, एकता और मानवीय संवेदनाओं को सर्वोच्च स्थान दें। इतिहास की उस त्रासदी से सीख लेकर हमें ऐसा समाज बनाना होगा, जहाँ किसी को भी अपने वतन से बेघर होने की नौबत न आए तथा नफरत के स्थान पर प्रेम, सौहार्द और सहयोग की संस्कृति विकसित हो।
कार्यक्रम के अंत में विभाजन से संबंधित ऐतिहासिक दस्तावेजों एवं चित्रों की प्रदर्शनी का अवलोकन कराया गया।
संगोष्ठी में प्रो. एहतेशामुलहक, प्रो. मुहम्मद ख़ालिद, डॉ. मीसम अब्बास, प्रो. काज़ी नदीम आलम, प्रो. खालिद शमीम, प्रो. रियाज मोहसिन, डॉ. संदीप कुमार यादव, डॉ. आसिम ख़ान, डॉ. शगुफ़्ता ख़ानम, डॉ. शाहीन बानो, हेरा रिजवान, डॉ. गीता, डॉ. नदीम अहमद, डॉ. हयात, डॉ. ज़फर आलम, श्री नवी हसन, डॉ. शालिनी मिश्रा, श्री मोनिस अब्बास सहित महाविद्यालय परिवार के शिक्षकगण एवं अन्य कर्मचारी उपस्थित रहे और कार्यक्रम को सफल बनाया।
