राष्ट्रीय ओलमा कौंसिल के Nurulhuda प्रदेश युवा अध्यक्ष ने सहारनपुर कलेक्vट्रेट मस्जिद ढाए जाने की ख़बर से आक्रोशित होकर प्रेस प्रतिनिधियों से बातचीत में कहा कि सहारनपुर में 1911 से पहले की बनी मस्जिद को बिना अपील का मौका दिए और कानूनी प्रक्रिया पूर्ण रूप से पालन किये आज सुबह अचानक से शहीद कर दिया गया। मस्जिद की ज़मीन काग़ज़ों में मुसलमानों के नाम मिल्कियत है, और इस मस्जिद के मामले में The Places of Worship Act, Waqf by User और Limitation Act जैसे महत्वपूर्ण कानून लागू होते हैं जो मस्जिद के अस्तित्व और वैधता का स्वयम ही सबसे बड़ा प्रमाण हैं। तो स्पष्ट है कि मस्जिद को ग़ैर कानूनी ढंग से ढ़हाया गया है। जब मामला अदालत में था, तो मस्जिद कमेटी को अपनी बात रखने और इंसाफ़ के लिए लड़ने का पूरा अवसर क्यों नहीं दिया गया? क्या ये अन्याय नही है? अगर सिर्फ सरकार की मंशा या सत्ता में बैठे हुए लोगों के राजनीतिक लाभ के लिए established process of law को दरकिनार किया जाएगा, तो फिर न्याय, लोकतंत्र, कानून के राज और संवैधानिक मूल्यों का महत्व ही क्या रह जाएगा? ये मुसलमानों से जुड़ा मामला है इसलिए सबको पता है कि कोई जवाबदेही नही होगी, कोई कार्यवाही नही होगी। जो चाहे जैसे चाहे जो कार्यवाही कर ले और कोई सवाल नही होगा? हमारी मांग है कि संवैधानिक मूल्यों और लोकतंत्र के हित में न्यायपालिका तत्काल स्वतः संज्ञान ले और इस तरह की दमनकारी कार्यवाही पर रोक लगाए ताकि कानून और संविधान का इक़बाल कायम रहे, इस कार्रवाई की वैधानिकता की जांच हो और जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय की जाए। क्या हमारे बड़ों ने भारत की आज़ादी में अपनी जाने इसीलिए क़ुर्बान की थीं कि एक रोज़ मुसलमानों की जान, इज़्ज़त, मकान, मस्जिद, मदरसे, मज़ार सब कानून और संविधान को परे रखते हुए सिर्फ इसलिए तोड़ दिए जाएंगे कि एक वर्ग विशेष की यही मंशा है? सत्ता पाने का यही रास्ता है? आज बुलडोज़र सिर्फ मस्जिद पे नही बल्कि संविधान की रूह पर भी चला है।

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