मोर्चरी हाउस में रखे गये शवों के ऊपर छत से टपकते पानी के साथ गिर रहा है छत का प्लास्टर।
कोई जिम्मेदारान इनकी भी शुध लेने वाला होता तो मोर्चरी हाउस में नहीं होती इनकी दुर्दशा।
आजमगढ़, मरने के बाद भी शवों की हो रही है दुर्गति, मंडलीय जिला अस्पताल के मोर्चरी हाउस में शवों की दुर्गति लगातार जारी है। शासन हो या प्रशासन किसी का भी खौफ जिम्मेदारों को नहीं है।
जिला अस्पताल में स्थित जिला अस्पताल के मोर्चरी हाउस में कभी शवों को चुंटे, चीटियां और चूहे कुतर कर खाते हैं कभी लावारिसों के शवों को रख कर भूल जाते हैं। हद तो तब हो गई जब जर्जर हो चुके मोर्चरी हाउस में रखे हुए शवों के ऊपर छत का टूट कर प्लास्टर गिर रहा है। बरसात में मोर्चरी हाउस के छत से पानी अंदर रखे हुए शवों पर गिर रहा है। पोस्टमार्टम करने के लिए शव के साथ आए हुए परिजन और पुलिस अपनी जान जोखिम में डालकर मोर्चरी में शवों को रखने और निकालने के लिए जाते हैं। क्योंकि जर्जर हो चुके मोर्चरी हाउस की छत के गिरने का खतरा हमेशा बना रहता है। सबसे ज्यादा खतरा तो बरसात के समय होता है जब छत से बरसात के पानी के साथ छत का प्लास्टर टूटकर शवों पर गिरता रहता है। स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदारान अधिकारी किसी बड़े हादसे के इंतजार में है, तब शायद यह जिम्मेदारान कुंभकरणीय नींद से जागेंगे।
मंडलीय जिला अस्पताल में लभगग पांच वर्ष पहले शासन के निर्देश पर 52 लाख रुपया खर्च करके आधुनिक मोर्चरी हाउस बनाया गया था ताकि शवों का बेहतर से रख-रखाव किया जा सके, स्वास्थ्य विभाग के दावे तो सिर्फ कागजों में चल रहे हैं लेकिन जमीनी हकीकत तो कुछ और ही है। इस मोर्चरी हाउस की देखरेख के लिए न तो सफाई कर्मी हैं और न ही चौकीदार हैं। सबसे ज्यादा कठिनाइयों का सामना तब करना पड़ता है जब रात में आए हुए शवों को टोर्च की रोशनी में मोर्चरी हाउस में रखना पड़ता है, मोर्चरी हाउस में ना तो बिजली है ना बल्ब शवों को रखने के लिए दो मोर्चरी हाउस बनाएं गए हैं जिसमें एक सीएमओ की देखरेख में तो वहीं दूसरा अस्पातल की मोर्चरी हाउस जिसकी देखरेख की जिम्मेदारी प्रमुख अधीक्षक की है।
पूर्व की घटनाओं के बाद भी जिम्मेदारानों की कुंभकरणीय नींद नहीं टूटी जिसके चलते जिला अस्पताल की जर्जर हो चुकी है मोर्चरी हाउस और उसमें रखे गये शव अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे हैं।
काश! मुर्दे बोल पाते तो शायद यही कहते साहब दुर्गति ना करो मेरी हम भी मुर्दे हैं।
