पीतांबरा धाम सरकार परिवार
पूज्य श्री विवेकानंद पराशर जी चैत्र (वासंतीय) नवरात्र 2025
*चैत्र नवरात्रि आरंभ- 30/03/2025*
*घटस्थापन-मुहूर्त (दिल्ली):- 30/03/2025*
*दिन- रविवार*
*शुभ मुहूर्त- 6:13 am से 10:22 am*
*अवधि- 4 घंटे 8 मिनट*
*घटस्थापना अभिजित मुहूर्त:-12:01 am से 12:50 pm*
*अवधि:- 50 मिनट*
घटस्थापना मुहूर्त रेवती योग के दौरान है।
*रेवती योग प्रारम्भ:- 29/03/2025, 7:28 pm*
*रेवती योग समाप्त:- 30/03/2025, 4:35 pm*
*प्रतिपदा प्रारम्भ- 29/03/2025, 4:27 pm*
*प्रतिपदा समाप्त- 30/03/2025, 12:49 pm*
*चैत्र नवरात्र वर्ष 2025 मे दिनांक 30 मार्च, रविवार से प्रांरभ होकर 6 अप्रैल 2025, रविवार (रामनवमी) तक चलेगे । दुर्गाष्टमी 5 अप्रैल तथा रामनवमी 6 अप्रैल को मनाई जायेगी। इस चैत्र मास नवरात्र मे तृतीया तिथि का क्षय हो रहा है, अतः दूसरा तथा तीसरा नवरात्र, 31 मार्च को ही मनाया जायेगा। इस प्रकार चैत्र नवरात्रो मे एक नवरात्रा कम रहेगा।*
1- पहला नवरात्र- 30/03/2025, रविवार:- मां शैलपुत्री पूजा (घटस्थापना)
2- दूसरा तथा तीसरा नवरात्र- 31/03/2025, सोमवार:-मां ब्रह्मचारिणी पूजा
तथा मां चंद्रघंटा पूजन
3. चौथा नवरात्र- 1/04/2025, मंगलवार:- मां कुष्मांडा पूजा
4. पांचवा नवरात्र- 2/04/2025, बुधवार, मां स्कंदमाता पूजा
5. छठा नवरात्र- 3/04/2025, वृहस्पतिवार:- मां कात्यायनी पूजा
6. सातवां नवरात्र- 4/04/2025, शुक्रवार:- मां कालरात्रि पूजा
7. आठवां नवरात्र- 5/04/2025 शनिवार:- मां महागौरी, (दुर्गाष्टमी)
8. नौवां नवरात्र- 6/04/2025 रविवार:- मां सिद्धिदात्री, (रामनवमी).
9. दसवां दिन- 7/04/2025, सोमवार:- दुर्गा प्रतिमा विसर्जन।
*चैत्रमास (वासंतिक नवरात्र) देवी पूजन विधान*
नवरात्र पूजन का सीधा तथा सामान्य सिद्वांत सूर्योदय से 10 घटी ( यानि 4 घंटे के बीच मे ) घटस्थापना यानि पूजा आंरभ करने का होता है, इसमे शुभ लग्न, शुभचौघडिया, अन्य ग्रह योग देखकर मुहूर्त तय किया जाता है।
मध्याह्नकाल, रात्रिकाल तथा सूर्योदय के उपरान्त सोलह घटी (चार घंटे) के पश्चात् का कोई भी समय घटस्थापना के लिये वर्जित होता है।
चैत्रमास नवरात्रो में रेवती या अश्वनी नक्षत्र में घट स्थापित करना चाहिए।
वैधृति योग में घटस्थापन से राज चोर अग्रिभय रहता है। (वर्ष 2025 मे शुभ, रेवती नक्षत्र तथा इन्द्र योग मे कलश स्थापना की जायेगी।)
यदि कोई भी शुभ मुहूर्त न मिलता हो तो अभिजित में घटस्थापन किया जा सकता है। 30 अप्रैल को अभिजित मुहूर्त 12:01 pm से 12:50 pm तक रहेगा। अतः इस अवधि मे भी घटस्थापन किया जा सकता है।
महाकाल संहिता के अनुसार वर्ष में चार नवरात्र आते हैं। अलग-अलग युग में अलग-अलग मास की महिमा रही है।
सतयुग में चैत्र शुक्लपक्ष के नवरात्र
त्रैतायुग में आषाढ़ नवरात्रो की महिमा रही है।द्वापर में माघ मास नवरात्र।
कलियुग में आश्विन मास की नवरात्र पूजा प्रधान है।
माना जाता है कि चैत्र नवरात्रि शैव तांत्रिकों के लिए होती है। इसके अंतर्गत तांत्रिक अनुष्ठान और कठिन साधनाएं की जाती है तथा दूसरी शारदीय नवरात्रि सात्विक लोगों के लिए होती है जो सिर्फ मां की भक्ति तथा उत्सव हेतु है।
नवरात्रि उत्सव देवी अंबा (विद्युत) का प्रतिनिधित्व है। वसंत की शुरुआत ( वांसतीय नवरात्रे-चैत्रमास- मार्च/अप्रैल) जलवायु और सूरज के प्रभावों का महत्वपूर्ण संगम माना जाता है। यह समय मां दुर्गा की पूजा के लिए पवित्र अवसर माना जाता है। इस त्योहार की तिथियाँ चांद्रमास के अनुसार निर्धारित होती हैं।
चैत्र मास नवरात्र मे प्रतिदिन जप-पाठादि करके अष्टमी को जागरण महापूजा करे। नवमी के दिन पारण कर दशमी को विसर्जन करना चाहिए।
नवरात्रि पर्व, माँ-दुर्गा की अवधारणा भक्ति और परमात्मा की शक्ति (उदात्त, परम,तथा रचनात्मक ऊर्जा) की पूजा का सबसे शुभ और अनोखी अवधि माना जाता है। यह पूजा वैदिक युग से भी पहले, प्रागैतिहासिक काल से की जाती है।
नवरात्रि का अर्थ है, नई रात अर्थात रात्रि में हो रहा परिवर्तन, यानि जलवायु तथा ऋतु मे हो रहा परिवर्तन। पृथ्वी के घूर्णन (घूमने) की वजह से यह परिवर्तन होते हैं, ऐसे परिवर्तन को सहने के लिए ही व्रत किए जाते हैं, और यह व्रत देवी के निमित्त इसलिए किए जाते हैं, क्योंकि देवी का एक नाम “कालरात्रि” भी है और “कालरात्रि” यानि कालपुरूष मे परिवर्तन करने वाली, अर्थात देवी ही “प्रकृति की भी अधिष्ठात्री देवी” है ।
*चैत्र नवरात्रि 2025 मे माता के वाहन:-*
मान्यता है कि हर नवरात्रि पर मां नव दुर्गा अलग-अलग वाहनों पर सवार होकर आती हैं और विदाई के वक्त मां का वाहन अलग होता है। पुराणों के अनुसार, मां दुर्गा के आगमन का वाहन आने वाले समय अर्थात भविष्य की घटनाओं के बारे में संकेत देता है, अर्थात माता दुर्गा नवरात्रो मे जिस वाहन से पृथ्वी पर आती हैं, उसके अनुसार साल भर होने वाली घटनाओं का भी आंकलन किया जाता है। वर्ष 2025 चैत्र नवरात्रि मे, मां हाथी पर सवार होकर आएंगी।
*चैत्र नवरात्र 2025 मे मां दुर्गा आगमन सवारी:-*
*इस बार नवरात्रि मां दुर्गा के आगमन सवारी ‘हाथी है।* हाथी पर सवार होकर माता रानी का आना शुभता, शांति, शक्ति, ज्ञान तथा समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। हाथी की सवारी होने से ज्यादा पानी बरसता है, यानि बरसात अधिक होती है। बरसात अच्छी होने का अर्थ है कि फसल का अच्छी होगी अच्छी फसल से समृद्धि आती है, अतः जब माता हाथी पर सवार होकर आती हैं, तो यह किसानों और भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए शुभ संकेत होता है।
*आगमन वाहन के नियम:-*
1. नवरात्रि की शुरुआत रविवार या सोमवार से होती है तो मां दुर्गा हाथी पर आती हैं, मां दुर्गा जब हाथी पर सवार होकर आती है तो ज्यादा पानी बरसता है।
2. अगर नवरात्रि की शुरुआत मंगलवार या शनिवार से होती है तो देवी घोड़े पर आती हैं। घोड़े पर मां दुर्गा सवार होकर आती हैं, तो युद्ध के हालात बनते हैं।
3. जब नवरात्रि बुधवार के दिन से शुरु होता है तो मां नौका की सवारी करके आती हैं। नौका पर सवार होकर माता रानी आती हैं तो शुभ फलदायी होता है।
4. जब नवरात्रि गुरुवार या शुक्रवार के दिन से शुरु होता है तो मां डोली की सवारी करके आती हैं। अगर मां डोली पर सवार होकर आती हैं तो महामारी का अंदेशा होता है। उस वर्ष देश में रोग, शोक व प्राकृतिक आपदा आती है।
*नवरात्रो मे माता की विदाई के वाहन:-*
जिस प्रकार से माता वार के अनुसार अलग-अलग वाहन पर सवार होकर आती है, उसी प्रकार जाते समय भी अलग-अलग वाहन से विदाई होती है, जिसका वाहन के अनुसार ही फल प्राप्त होता है।
मां दुर्गा की विदाई के वाहन तथा उनका फल-
1. रविवार या सोमवार को मां दुर्गा भैंसे की सवारी से प्रस्थान करती हैं। जिससे देश में रोग और कष्ट बढ़ता है।
2. शनिवार या मंगलवार को मां दुर्गा चरणायुध (मुर्गे) पर सवार होकर जाती हैं। जिससे जनता में दुख और कष्ट बढ़ता है।
3. बुधवार या शुक्रवार को देवी मां हाथी पर सवार होकर प्रस्थान करती हैं। इससे बारिश ज्यादा होती है।
4. गुरुवार को मां दुर्गा मनुष्य की सवारी से जाती हैं। इसका अर्थ है कि सुख-शांति बनी रहेगी।
चैत्र नवरात्र 2025 मे, देवी दुर्गा हाथी (शुभ) पर सवार होकर आएंगी, तथा इस बार मां के विदाई का वाहन ‘भैंसा’ (अशुभ) है।
(देवी के आगमन का वाहन हाथी अधिक बारिश होने से सामान्य रूप से अच्छा होता है, परन्तु विदाई का वाहन ‘भैंसा’ होने से रोग तथा कष्ट का सूचक है। अतः अनिष्ट फल की शान्ति हेतु सभी भक्तो को देवी की आराधना करनी चाहिए, जिससे और अशुभ फल का परिणाम निरस्त हो तथा शुभ फल प्राप्त हो सके।)
अठारह भुजाओ वाली ‘मां महिषमर्दिनी” चैत्र नवरात्र में ही उत्पन्न हुई थी। भगवती का यह पर्व “रक्त चामुण्डा” नामक दूसरे रूप में भी मनाया जाता है। ये रक्तदन्तिका खड्ग, पानपात्र, मूसल व लाङ्गल धारण किये हुये है। दुर्गासप्तशती में खड्ग, पानपात्र शिर एवं खेट धारण किये हुये बताया हैं। (तारकासुर के आतंक से दुःखी होकर विष्णु ने सपत्नीक हिमालय पर लेखा “ह्रीं बीज से भुवनेश्वरी की उपासना की तब चैत्र शुक्ला नवमी तिथि शुक्रवार को भगवती ने प्रकट होकर देवताओं को वर दिया)।
रक्तदंतिकाः- रक्त चामुण्डा के बाद भीमा देवी की उत्पत्ति हुई, यह माता एकवीरा, कालरात्रि भी है चैत्र नवरात्र में भीमा देवी के पूजन से पुत्र की प्राप्ति होती हैं।
इस प्रकार सातवे नवरात्रे से नवम नवरात्र तक विशेष पूजा विधान हैं।)
चैत्र शुक्ला सप्तमी (सातवे नवरात्रे) को लवङ्गपुष्पों से कृष्णवर्ण छाग बलि से पूजा करनी चाहिए।
कालिका पुराण मे वर्णित है कि अष्टमी से छाग पूजा ‘ॐ दुर्गे दुर्गे रक्षाणि स्वाहा’ मंत्र तथा अशोक पुष्पों से पूजा करें।
देवीपुराण के अनुसार नवमी कल्प हेतु महिषासुरमदिनी की पूजा कुंकुम, अगर, शमीपत्र (मरुपत्र) पान ध्वज, तर्पण विधान सहित करें।
🚩 *जय मां काली*🚩
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