पीतांबरा धाम सरकार आजमगढ़ पूज्य श्री विवेकानंद पराशर जी महराज जी ने बताया श्राद्ध कर्म करना हमारा धर्म है-संपर्क सूत्र /7388891440

परंपरानुसार पुत्र का पुत्रत्व तभी सार्थक होता है, जब वह अपने माता-पिता की सेवा करे व उनके मरणोपरांत उनकी मृत्यु तिथि व महालय ( पितृपक्ष ) में विधिवत श्राद्ध करे। प्रत्येक मानव पर जन्म से ही तीन ऋण होते हैं – देव, ऋषि व पितृ। श्राद्ध की मूल संकल्पना वैदिक दर्शन के कर्मवाद व पुनर्जन्मवाद पर आधारित है। मनु व याज्ञवल्क्य ऋषियों ने धर्मशास्त्र में नित्य व नैमित्तिक श्राद्धों की अनिवार्यता को रेखांकित करते हुए कहा कि श्राद्ध करने से कर्ता पितृ ऋण से मुक्त हो जाता है तथा पितर संतुष्ट रहते हैं जिससे श्राद्धकर्ता व उसके परिवार का कल्याण होता है। श्राद्ध महिमा में कहा गया है –

*आयुः पूजां धनं विद्यां स्वर्ग मोक्ष सुखानि च।*

*प्रयच्छति तथा राज्यं पितरः श्राद्ध तर्पिता।।*

जो लोग अपने पितरों का श्राद्ध श्रद्धापूर्वक करते हैं, उनके पितर संतुष्ट होकर उन्हें आयु, संतान, धन, स्वर्ग, राज्य मोक्ष व अन्य सौभाग्य प्रदान करते हैं।

हमारी संस्कृति में माता-पिता व गुरु को विशेष श्रद्धा व आदर दिया जाता है, उन्हें देव तुल्य माना जाता है।

*पितरं प्रीतिमापन्ने प्रियन्ते सर्वदेवताः।*

अर्थात पितरों के प्रसन्न होने पर सारे ही देवता प्रसन्न हो जाते हैं।

 

श्राद्धकर्म पक्ष में पितर (पूर्वज) अपने चहेते लोगों (वंशज) के द्वार पर सूर्योदय से सूर्यास्त तक दरवाजे पर खड़े रहते हैं और अपने वंशजों द्वारा धान, वस्त्रादि दान करने पर उन्हें ग्रहण करते हैं और शुभाशीर्वाद देते हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराणानुसार सामथ्र्यवान होते हुए भी जो व्यक्ति पितरों का श्राद्ध नहीं करता, उसके पितर उसे शाप दे देते हैं, जिससे वह रोगी, दुखी या वंशहीन हो जाता है। अतः हमारी संस्कृति में श्राद्ध का बहुत महत्व है।

 

अतः इस श्राद्धपक्ष में अपने पितरों का श्राद्ध, तर्पण व पंचबलि कराए।

कहां गया है कि पिता के जिस शुक्राणु के साथ जीव माता के गर्भ में जाता है, उसमें 84 अंश होते हैं, जिनमें से 28 अंश तो शुक्रधारी पुरुष के स्वयं के भोजनादि से उपार्जित होते है और 56 अंश पूर्व पुरुषों के रहते हैं। उनमें से 21 अंश उसके पिता के 15 अंश पितामह के, 10 अंश प्रपितामह के, 6 अंश चतुर्थ पुरुष के, 3 पंचम पुरुष के और एक षष्ठ पुरुष के होते हैं। इस तरह सात पीढियो तक वंश के सभी पूर्वजों के रक्त की एकता रहती है। अतः पिंडदान मुख्यतः तीन पीढ़ियों तक के पितरों को ही दिया जाता है क्योंकि ऊपर वाले पितरों के दस से कम अंश जीवात्मा को मिलते हैं। हमारे भीतर प्रवाहित रक्त में हमारे पितरों के अंश हैं, जिसके कारण हम उनके ऋणी होते हैं। यह ऋण उतारने के लिए श्राद्ध कर्म करना हमारा धर्म है। पितरों के लिए श्रद्धा से श्राद्ध करना हमारा कर्तव्य है। श्राद्ध करना क्यों जरूरी है: श्राद्ध करने से पहले हमें यह जान लेना चाहिए कि शरीर से निकली आत्मा के समक्ष केवल दो मार्ग होते हैं – प्रकाश मार्ग या कृष्ण मार्ग। उच्च शुद्ध कर्मों के कारण जो अपने भीतर तेज प्रकाश ले जाते हैं, उनकी आत्मा तो स्वर्ग लोक, विष्णुलोक, ब्रह्मलोक की ओर चल पड़ती है, परंतु असामान्य या पापकर्म वाले की आत्मा अंधकार मार्ग से सोम (पितृ) की ओर जाती है। इस यात्रा में उन्हें स्वयं शक्ति की आवश्यकता होती है, जिसकी पूर्ति हम पिण्डदान, तर्पण व पंचबलि द्वारा करते हैं।पीतांबरा धाम सरकार ट्रस्ट (न्यास) ग्राम व पोस्ट बद्दोपुर तहसील सदर जिला आजमगढ़ उत्तर प्रदेश

कार्यालय,= 1बद्दोपुर आजमगढ़

संस्था का उद्देश्य मां पीतांबरा का मंदिर बनाना आजमगढ़

सनातन को आगे ले जाना गरीब असहाय लोगों की मदद करना

बहन बेटियों का विवाह करना गुरुकुल का निर्माण करना

बेरोजगारी को दूर करना

लघु उद्योग कारण

मां पीतांबरा के रहस्य को बताना

देवी पुराण की कथा करना

हॉस्पिटल बनवाना निशुल्क सेवा करनातंत्र शास्त्र और साधना सीखने के लिए सम्पर्क कर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *