आर्यमगढ़ में विराट हिन्दू सम्मेलन बना सनातन चेतना, संगठन और सामाजिक जागरूकता का महासंगम
हजारों की ऐतिहासिक सहभागिता, संत-वक्ताओं ने हिन्दू एकता, शिक्षा और आत्मरक्षा का किया आह्वान
आर्यमगढ़ नगर में श्रीगणेश बस्ती एवं श्रीराम बस्ती के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित विराट हिन्दू सम्मेलन सनातन संस्कृति, सामाजिक संगठन और राष्ट्रचेतना का भव्य प्रतीक बनकर उभरा। नगर सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से आए हजारों की संख्या में सनातन धर्मावलंबियों ने सम्मेलन में सहभागिता कर आयोजन को ऐतिहासिक स्वरूप प्रदान किया। कार्यक्रम में संत-महात्माओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, युवाओं एवं मातृशक्ति की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।
सम्मेलन के मुख्य वक्ता आदरणीय श्रीमान अनिल जी, क्षेत्र प्रचारक (पूर्वी उत्तर प्रदेश) रहे, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में स्वामी चिदम्बरानन्द सरस्वती जी महाराज ने कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। विशिष्ट अतिथियों में श्री लालबाबा जी, अच्छेलाल जी, सुनीता विश्वकर्मा, सुरेन्द्र यादव, शंकर दास जी, भागवत राम जी, हरिवंश सोनकर, जगदीश जी, प्रेमशीला जी, रविदास समिति के पदाधिकारी सहित अन्य संत-महात्मा प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।
इसके अतिरिक्त सम्मेलन में श्री दीनानाथ जी (विभाग प्रचारक), रमाकांत जी (जिला प्रचारक), ओमप्रकाश पाण्डेय, गुड्डू सिंह, बलराम सिंह, संजय मिश्रा, सत्य विजय राय, अखिलेश मिश्रा (गुड्डू), शिवप्रकाश राय, गोल्डी राय, अजय वर्मा, विजय पाण्डेय, रामनगीना, टी.पी. सिंह, राजू वर्मा, रवि प्रताप सिंह, जनार्दन राय, अविनाश राय, नीरज सिंह, धर्मवीर सहित बास फोर समिति के पदाधिकारी एवं बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
संगठन ही समाज की सबसे बड़ी शक्ति
मुख्य अतिथि स्वामी चिदम्बरानन्द सरस्वती जी महाराज अपने ओजस्वी संबोधन में कहा,
“हिन्दू समाज को संगठित होकर रहना चाहिए, क्योंकि संगठन में ही समाज, संस्कृति और राष्ट्र का सर्वांगीण कल्याण निहित है।”
उन्होंने सामाजिक समरसता, आत्मसम्मान और सांस्कृतिक चेतना को सुदृढ़ करने पर विशेष बल दिया।
इतिहास, राष्ट्रचेतना और शिक्षा पर स्पष्ट विचार
मुख्य वक्ता आदरणीय अनिल जी ने कहा कि देशभर में आयोजित हो रही हिन्दू सम्मेलनों की श्रृंखला समाज को जागृत करने का सशक्त माध्यम है। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म ने सदियों तक अत्याचारों का सामना किया, फिर भी अपनी संस्कृति और मूल्यों को अक्षुण्ण बनाए रखा।
उन्होंने गुरु तेगबहादुर जी के बलिदान का स्मरण करते हुए कहा कि उनके त्याग से सनातन धर्म की रक्षा संभव हुई। स्वतंत्रता संग्राम में “वंदे मातरम्” और “भारत माता की जय” जैसे नारों की भूमिका को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि इन घोषों ने जनमानस में राष्ट्रभक्ति की चेतना जागृत की और युवाओं को आंदोलन से जोड़ा।
पंडित मदन मोहन मालवीय जी का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) की स्थापना कर उन्होंने यह सिद्ध किया कि शिक्षा समाज को जोड़ने का सशक्त माध्यम है, जहां सभी वर्गों के लोग समान रूप से शिक्षा प्राप्त करते हैं।
वर्तमान समय में शिक्षा के क्षेत्र में अवैध एवं नियमविरुद्ध संस्थानों पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि शिक्षा के नाम पर किसी भी प्रकार की अनियमितता समाज और राष्ट्र—दोनों के लिए घातक है, जिस पर विधि-सम्मत कार्रवाई आवश्यक है।
आत्मरक्षा और सनातन प्रतीकों का संदेश
मुख्य वक्ता ने सनातन परंपरा के सांस्कृतिक प्रतीकों का उल्लेख करते हुए कहा,
“हिन्दू समाज को आत्मरक्षा, आत्मसम्मान और संगठन के लिए त्याग व संकल्प की भावना अपनानी होगी। हमें अपनी रक्षा के लिए ‘सोना बेचकर लोहा खरीदने’ की मानसिकता विकसित करनी चाहिए,”
अर्थात विलासिता से ऊपर उठकर समाज, संस्कृति और राष्ट्र की सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी।
उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम का धनुष-बाण और भगवान शिव शंकर का त्रिशूल यह संदेश देता है कि सनातन धर्म करुणा के साथ-साथ धर्मरक्षा की क्षमता भी सिखाता है।
जागरूक हिन्दू समाज का आह्वान
उन्होंने समाज को जाति और वर्ग के नाम पर बांटने वाले प्रयासों से सतर्क रहने तथा गांव-गांव और जिला-जिला में सांस्कृतिक चेतना जागृत करने का आह्वान किया। कार्यक्रम के अंत में ओमप्रकाश जी ने सभी अतिथियों एवं सहभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
भारत माता की आरती से भव्य समापन
कार्यक्रम का समापन भारत माता की आरती के साथ हुआ। “भारत माता की जय” एवं “जय श्रीराम” के गगनभेदी नारों से पूरा वातावरण राष्ट्रभक्ति और सनातन चेतना से ओत-प्रोत हो गया। आयोजकों द्वारा सभी अतिथियों, वक्ताओं एवं विशाल जनसमूह के प्रति आभार प्रकट किया गया।
