प्रत्येक वर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को मनाई जाने वाली भगवान जगन्नाथ की स्नान यात्रा हिंदू धर्म की उन महान परंपराओं में से एक है, जो भगवान की दिव्य लीला को धरती पर उतारती है। यह उत्सव केवल एक स्नान समारोह नहीं, बल्कि भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक शुद्धि का प्रतीक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस दिन जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी को 108 कलशों से स्नान कराया जाता है, जिससे उनके विग्रह शीतल और पवित्र हो जाते हैं। यह यात्रा भक्तों को याद दिलाती है कि भगवान भी अपने भक्तों की भक्ति से प्रसन्न होकर उनके साथ एकाकार हो जाते हैं। आजमगढ़ के ISKCON केंद्र में इस पावन अवसर पर भक्ति की ऐसी ज्योति जली कि पूरा परिसर दिव्यता से भर गया।

जय जगन्नाथ! जय बलदेव! जय सुभद्रा!” की गूंज के साथ शुरू हुआ यह स्नान उत्सव भक्तों के हृदय को स्पर्श कर गया। सुबह से ही ISKCON आजमगढ़ केंद्र पर भक्तों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। महिलाएं, पुरुष, बच्चे और बुजुर्ग — सभी अपनी पूरी भक्ति भावना के साथ उपस्थित थे। मंदिर परिसर को फूलों, रंग-बिरंगी झालरों और दीपों से सजाया गया था, जो देखते ही मन मोह लेता था।जैसे ही कार्यक्रम की शुरुआत हुई, हरे कृष्ण महामंत्र  “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”की ध्वनि पूरे पंडाल में गूंजने लगी। भक्तों के कंठ से निकलती यह दिव्य ध्वनि वातावरण को भक्ति रस से सराबोर कर रही थी। मंच पर विराजमान भगवान जगन्नाथ, बलदेव और सुभद्रा जी के विग्रह अत्यंत आकर्षक और दिव्य दिख रहे थे। भक्तों ने पूर्ण समर्पण के साथ विभिन्न द्रव्यों से अभिषेक किया।

सबसे पहले **पुष्प अभिषेक** हुआ। भक्तों ने सुगंधित फूलों की वर्षा की, जिससे पूरा मंदिर महक उठा। इसके बाद **पंचामृत अभिषेक** का नवीनतम क्रम चला। दूध, दही, घी, शहद और चीनी से बने पंचामृत से भगवान को स्नान कराया गया। भक्तों ने **दही अभिषेक** भी विशेष रूप से किया, जो परंपरा के अनुसार शीतलता और मिठास का प्रतीक माना जाता है। कई भक्त अपने घरों से लाए गए पवित्र द्रव्यों — गंगा जल, केसर, चंदन, इत्र और अन्य मंगल द्रव्यों — से भी भगवान का अभिषेक किया। हर अभिषेक के साथ भक्तों की आँखें नम थीं और होंठों पर जयकार गूंज रहा था — **“जय जगन्नाथ! जय जगन्नाथ!”**अभिषेक के बाद भगवान का सिंगार किया गया। चांदी के आभूषण, फूलों के हार, मोतियों की मालाएं और रेशमी वस्त्रों से जगन्नाथ जी को सजाया गया। उनका स्वरूप देखकर हर भक्त मुग्ध हो गया। कई भक्त भाव-विभोर होकर रो पड़े। सिंगार के बाद भगवान को **छप्पन भोग** अर्पित किया गया। विभिन्न प्रकार के व्यंजन, मिठाइयाँ, फल और पकवान भगवान के समक्ष रखे गए।

कार्यक्रम के दौरान **कीर्तन** का सिलसिला लगातार चलता रहा। ISKCON के संन्यासी और भक्तों ने मधुर स्वर में भजन गाए, जिनमें “जगन्नाथ स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे…” जैसे लोकप्रिय भजन शामिल थे। भजन की लय पर भक्त नाचते-गाते दिख रहे थे। पूरा पंडाल भक्ति की मस्ती में डूबा हुआ था।

उत्सव के अंत में सभी भक्तों को प्रसाद स्वरूप भंडारे का भोजन कराया गया। ISKCON की परंपरा के अनुसार शुद्ध सात्विक भोजन — खीर, पूरी, सब्जी, हलवा और अन्य व्यंजन — परोसे गए। भक्तों ने भगवान के छप्पन भोग का प्रसाद ग्रहण करते हुए आशीर्वाद प्राप्त किया। एक बुजुर्ग भक्त ने बताया, “यहाँ का प्रसाद खाकर लगता है मानो भगवान स्वयं हमारे घर आए हों।”

स्नान यात्रा का महत्व केवल दर्शन तक सीमित नहीं है। यह भक्तों को सिखाती है कि शारीरिक शुद्धि के साथ आंतरिक शुद्धि भी आवश्यक है। जगन्नाथ जी को स्नान कराने की परंपरा रथ यात्रा की तैयारी भी मानी जाती है। ISKCON आजमगढ़ केंद्र के इस आयोजन ने स्थानीय भक्तों को एक मंच प्रदान किया जहां वे अपनी आस्था को प्रकट कर सके। इस कार्यक्रम से सैकड़ों नए भक्त भी जुड़े, जिन्होंने हरे कृष्ण मंत्र जपना शुरू किया।

यह आयोजन हमें याद दिलाता है कि भक्ति किसी जाति, वर्ग या उम्र की बेड़ियों में बंधी नहीं होती। हर कोई भगवान तक पहुंच सकता है, बस सच्चे हृदय की जरूरत है। ISKCON आजमगढ़ केंद्र ने इस स्नान उत्सव के माध्यम से पूरे क्षेत्र में भक्ति की लहर पैदा कर दी है।

आप भी इस दिव्य परंपरा का हिस्सा बनें। अगली रथ यात्रा या किसी भी उत्सव में ISKCON आजमगढ़ केंद्र अवश्य पधारें। घर बैठे हरे कृष्ण महामंत्र का जाप करें, भगवान जगन्नाथ की कृपा प्राप्त करें। जय जगन्नाथ!

यह स्नान उत्सव केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि जीवन भर याद रहने वाला आध्यात्मिक अनुभव था। भक्तों के चेहरे पर छाई प्रसन्नता और आँखों में झलकती श्रद्धा इस बात का प्रमाण है कि भगवान जगन्नाथ अपने भक्तों पर सदैव कृपा बनाए रखते हैं।

**हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।**

**हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।**

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