इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नाबालिग लड़की से दुष्कर्म, आपराधिक धमकी देने और अश्लील वीडियो बनाकर प्रसारित करने के मामले में जांच अधिकारी की कड़ी आलोचना की है। कोर्ट ने यूपी के डीजीपी को निर्देश दिया है कि ऐसे मामलों में जो सूचना और तकनीक से जुड़ा हो, सभी जांच अधिकारियों को निर्देश दें कि वे ऐसे मामलों की जांच में भविष्य में काफी सावधानी बरतें। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने आजमगढ़ के आरोपी सौरभ की जमानत अर्जी पर सुनवाई करते हुए की। कोर्ट ने डिजिटल साक्ष्य से जुड़े मामलों में अधिकारियों के उदासीन रवैये पर नाराजगी भी जताई।मौजूदा मामले में सामूहिक दुष्कर्म, आपराधिक धमकी और नाबालिग लड़की के अश्लील वीडियो प्रसारित करने के आरोप शामिल हैं। मुख्य आरोपी सौरभ कुमार और एक सह-आरोपी पर भारतीय दंड संहिता की धारा 376 डीबी और 506, यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम ( पाक्सो) की धारा 5 जी और 5 एम/जी और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67 के तहत आरोप लगाए गए हैं।पीड़िता को आरोपियों ने ब्लैकमेल किया और धमकाया। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि सौरभ कुमार और सह-आरोपी सेहबान ने एक नाबालिग लड़की को उसके स्कूल से बहला-फुसलाकर उसके साथ यौन उत्पीड़न किया। उन पर घटना का वीडियो बनाने और व्हाट्सएप के माध्यम से वीडियो प्रसारित करने का भी आरोप है। कथित तौर पर वीडियो पीड़िता के भाई के मोबाइल डिवाइस पर सामने आया। जिसके बाद तीन अप्रैल, 2024 को प्राथमिकी थाना अहरौला, जिला आजमगढ़ में दर्ज की गई।

कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से प्राप्त तस्वीरों और वीडियो के बारे में साक्ष्यों की विवेचना करने में पर्याप्त रूप से सतर्क नहीं हैं। उन्होंने पेन ड्राइव में तस्वीरें या वीडियो लेकर फोरेंसिक विश्लेषण के लिए फोरेंसिक साइंस लैबोरेटरी में भेजकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लिया है। ऐसा लगता है कि यह कृत्य सिर्फ दूसरों पर दोष मढ़ने जैसा है। इस कृत्य को रोकना होगा।” हाईकोर्ट ने इस जमानत याचिका पर सुनवाई के लिए 27 सितंबर 2024 को फिर से सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है।

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